
कहानी थोड़ी फिल्मी है !
इन वादियों को देख कर उसकी याद आती है,
की वो होती तो कैसा होता,
उसकी आहों में, बाहों में, पनाहों में खो जाने को दिल करता है,
उन जुल्फों की छाव में सो जाने को दिल करता है।
वे बीते पुराने दिन जब याद आते हैं तो मष्तिष्क के कुछ पन्ने जिनपे सदियों की धुल थी फिर पढ़े जाने को बेक़रार हुए जाते हैं।
वो क्या दिन थे जब हम साथ रहा करते थे,
संग जीने मरने की कसमे खाया करते थे,
मुझे याद है किस तरह मैंने दीवारों और पेड़ो पे मैंने हम दोनों के नाम लिखे थे,
उसे पाकर मैं कितना खुश था -
अक्सर सोचता था ऊपर वाले ने दोनों जहाँ की ख़ुशी मेरे हिस्से में डाल दी है।
पर कितना गलत था मैं -
आज तन्हाई की चादर ओढ़े, अर्थविहीन जीवन जीते वो गुज़रे पल याद आते हैं तो लगता है नियति ने मेरे साथ कितना क्रूर व्यवहार किया।
कैंसर ने उसे मुझसे छीन लिया।
उसकी दुर्बल कातर आखें, जिन में कभी झील सी गहराई और मोतियों जैसी चमक हुआ करती थी,
मुझे निरंतर निवेदन करती रही की -
"मुझे बचा लो मैं मरना नहीं चाहती"
और मैं -- मैं निस: सहाय अवस्था में खड़ा अपनी आखों के सामने अपनी साँसों को अंतिम साँसें लेते हुए देखने के सिवा और कुछ न कर सका।
आज इतने सालो बाद बहुत कुछ बदल चुका है,
जिन दिवारो पे हमारे नाम थे उनपर नया रंग कर दिया गया,
पुराने बगीचे के पेड़ भी नहीं रहे,
पर मेरे प्रेम की अविरल गंगा अभी भी खून बनके मेरे शरीर में दौड़ रही है।
पर मैं प्रसन्न हूँ ; संतुष्ट हूँ; तृप्त हूँ ,
क्योंकी मेरी इश्वर से बात हो चुकी है और उसने कहा है चौथे जन्म में किरण मेरी होगी..

