Mind Controls All

Saturday, December 19, 2009



कहानी थोड़ी फिल्मी है !

इन वादियों को देख कर उसकी याद आती है,

की वो होती तो कैसा होता,

उसकी आहों में, बाहों में, पनाहों में खो जाने को दिल करता है,

उन जुल्फों की छाव में सो जाने को दिल करता है।




वे बीते पुराने दिन जब याद आते हैं तो मष्तिष्क के कुछ पन्ने जिनपे सदियों की धुल थी फिर पढ़े जाने को बेक़रार हुए जाते हैं।


वो क्या दिन थे जब हम साथ रहा करते थे,

संग जीने मरने की कसमे खाया करते थे,

मुझे याद है किस तरह मैंने दीवारों और पेड़ो पे मैंने हम दोनों के नाम लिखे थे,

उसे पाकर मैं कितना खुश था -

अक्सर सोचता था ऊपर वाले ने दोनों जहाँ की ख़ुशी मेरे हिस्से में डाल दी है।




पर कितना गलत था मैं -

आज तन्हाई की चादर ओढ़े, अर्थविहीन जीवन जीते वो गुज़रे पल याद आते हैं तो लगता है नियति ने मेरे साथ कितना क्रूर व्यवहार किया।




कैंसर ने उसे मुझसे छीन लिया।



उसकी दुर्बल कातर आखें, जिन में कभी झील सी गहराई और मोतियों जैसी चमक हुआ करती थी,

मुझे निरंतर निवेदन करती रही की -

"मुझे बचा लो मैं मरना नहीं चाहती"

और मैं -- मैं निस: सहाय अवस्था में खड़ा अपनी आखों के सामने अपनी साँसों को अंतिम साँसें लेते हुए देखने के सिवा और कुछ न कर सका।



आज इतने सालो बाद बहुत कुछ बदल चुका है,

जिन दिवारो पे हमारे नाम थे उनपर नया रंग कर दिया गया,

पुराने बगीचे के पेड़ भी नहीं रहे,

पर मेरे प्रेम की अविरल गंगा अभी भी खून बनके मेरे शरीर में दौड़ रही है।




पर मैं प्रसन्न हूँ ; संतुष्ट हूँ; तृप्त हूँ ,

क्योंकी मेरी इश्वर से बात हो चुकी है और उसने कहा है चौथे जन्म में किरण मेरी होगी..

Friday, December 18, 2009




Restlessness
how much anna ? -100 rupeesa
क्या??
100 rupees for such a trivial thing?I thought it would hardly cost me 30. I sweared.
Quadruple difference..rough mental calculation flushed me that. I sweared again.
Is it the burgeoning economy?
Just the anna's machiavellianism?
Have I become obsolete?
Or infact a miser?
ढेरो प्रश्न अन-सुलझे से, पर उत्तर के तलाश में भटकने से डर लगता है। क्यूकि introspection hurts and cursing rejuvenates - I thought.
ऐसा मेरे साथ कोई पहली बार नहीं हुआ। अजी पैसे का क्या है - आज है, कल और होगा, परसों और ज्यादा । Human turn into insatiable devil when it comes to wealth.
So saving myself some Rs70 is not an issue here.
The concern is - queries enter and leave my mind unattended at lightening speed, with the subject usually getting a maa-behen tag to it if it dis-pleases me.
But I never halt, sit aside and try to resolve them. This is how I have always been since I learnt the difference between good & not-good, right & not-right. I conceive qustions of all kinds and keep pondering over them.
Cursing almost everything I find related. But never wanting to find the answer to those questions.
After all bad-mouthing is a bihari's forte!
But where is this eventually leading me to?

I met with an accident a couple of days back.
Post injuries to by motorbike, when I was with myself, checking out my bodily injuries, I realized - I was lost in thoughts of cursing the reckless government bus driver while the my eyes didnt notice another vehicle ahead.

I have to stop being a pressure cooker.
Atleast it has a whistle, unlike me.
musical dil
समझ में नहीं आ रहा क्या लिखूं। आज तक सिर्फ मौखिक बकवास करने का मौका मिला है। लिखित ये पहला अनुभव है।
''गोरी हैं कलाइयां तू ला दे मुझे हरी हरी चूड़ियां''
''कितनी बेचैन होके तुमसे मिली''
क्या यार आज मन में सिर्फ महिलायों वाले गाने क्यों आ रहे हैं?जैसे मैंने ladies संगीत में participate किया हो!
सब कुछ बढ़िया ना?
- बिलकुल..दिल, दिमाग, ये, वो, सभी अपनी जगह पे हैं। तो फिर ऐसे डरावने ख्याल/गाने क्यों आ रहे हैं..आज तक सुना था हर इंसान के दिल में एक बच्चा होता है।
पर आज पहली बार महसूस हुआ की दिल में बच्चे के साथ साथ उसकी अम्मी भी रहती हैं, और बच्चे बिना माँ के बिगड़ जाते हैं इसीलिए मैंने सोचा की बिना डरे हुए, बिना सहमे हुए दिल की guitar बजने दो।
वैसे भी मर्दों को जब इस तरह के जब विडियोs पसंद आते हैं तो फिर ऑडियोs क्यों नहीं?
--बाकी बकवास अगले अंक में !